संपूर्ण चालीसा, आरती व व्रत कथा
शुद्ध हिंदी | प्रतिदिन पाठ | सरल भाषा
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय की बात है, एक वन में एक चील और एक सियारिन रहती थीं और दोनों में गहरी मित्रता थी एक दिन दोनों ने कुछ महिलाओं को जितिया व्रत करते और भगवान जीमूतवाहन की पूजा करते देखा उन्होंने इस व्रत के बारे में जानकारी प्राप्त की व्रत के महत्व को जानकर दोनों ने भी संतान की लंबी आयु और सुख-समृद्धि की कामना से जितिया व्रत रखने का संकल्प लिया व्रत का दिन आया तो दोनों ने उपवास रखा और भगवान जीमूतवाहन का स्मरण किया।
चील ने पूरी श्रद्धा और नियम के साथ व्रत रखा उसने पूरे दिन संयम बनाए रखा और पूजा-पाठ में मन लगाया दूसरी ओर, सियारिन से भूख सहन नहीं हुई रात में उसे बहुत तेज भूख लगी और उसने व्रत का नियम तोड़ दिया उसने भोजन कर लिया इस प्रकार चील ने पूरी निष्ठा से व्रत पूरा किया, जबकि सियारिन व्रत का पालन नहीं कर सकी समय बीतने के बाद दोनों ने मनुष्य योनि में जन्म लिया मान्यता के अनुसार, चील का जन्म एक धर्मपरायण स्त्री के रूप में हुआ और सियारिन का जन्म भी एक स्त्री के रूप में हुआ और दोनों बहनें बनीं बड़ी बहन के रूप में चील का पुनर्जन्म हुआ और छोटी बहन के रूप में सियारिन का।
बड़ी बहन का विवाह एक राजपरिवार में हुआ, जबकि छोटी बहन का विवाह भी एक संपन्न परिवार में हुआ दोनों के जीवन में संतान का सुख आया बड़ी बहन जितिया व्रत की महिमा और नियमों का श्रद्धापूर्वक पालन करती थी वह अपनी संतान की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए नियमित रूप से व्रत रखती थी छोटी बहन के जीवन में कई बार संतान से जुड़ी परेशानियां आने लगीं उसकी संतानें जन्म लेने के बाद अधिक समय तक जीवित नहीं रह पाती थीं इससे वह बहुत दुखी रहने लगी।
एक दिन उसने अपनी बड़ी बहन से इसका कारण पूछा तब बड़ी बहन ने उसे पूर्वजन्म की बात और जितिया व्रत के महत्व के बारे में बताया उसने समझाया कि व्रत केवल भूखे रहने का नाम नहीं है, बल्कि श्रद्धा, संयम, नियम और संकल्प के साथ भगवान जीमूतवाहन का स्मरण करना इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है, छोटी बहन को अपनी भूल का एहसास हुआ, उसने श्रद्धापूर्वक भगवान जीमूतवाहन की आराधना करने और विधि-विधान से जितिया व्रत रखने का संकल्प लिया।
कथा के अनुसार, भगवान जीमूतवाहन त्याग, करुणा और संतान की रक्षा के प्रतीक माने जाते हैं उनकी कृपा से संतान की रक्षा और परिवार के सुख-समृद्धि की कामना पूरी होती है, इसी कारण माताएं जितिया या जीवित्पुत्रिका व्रत अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य, सुख और सुरक्षा की कामना से रखती हैं, व्रत के दौरान भगवान जीमूतवाहन की पूजा की जाती है और व्रत कथा का श्रवण किया जाता है।
दूसरी कथा
जब वृद्धावस्था में जीमूत वाहन के पिता ने अपना सारा राजपाठ त्यागकर वानप्रस्थ आश्रम जाने का निर्णय लिया, तब जीमूत वाहन को राजा बनने में कोई रुचि नहीं थी। इसलिए उन्होंने अपने साम्राज्य को अपने भाइयों को सौंपकर अपने पिता की सेवा करने के लिए जंगल की ओर प्रस्थान किया। जीमूत वाहन का विवाह मलयवती नामक एक राजकन्या से हुआ। एक दिन, जीमूत वाहन जब जंगल में जा रहे थे तो उन्हें एक बूढ़ी महिला रोते हुए दिखी। जीमूतवाहन को पता चला कि वह नागवंश की स्त्री है। वृद्ध महिला ने आगे बताया कि नागों ने पक्षियों के राजा गरुण को रोजाना खाने के लिए नागों की बलि देने का वचन दिया है और इसी के कारण अब उसके बेटे शंखचूड़ की बारी है।
यह सुन जीमूत वाहन ने महिला को कहा कि वह स्वयं अपनी बलि दे देंगे। इसके बाद, जीमूत वाहन ने शंखचूड़ से लाल कपड़ा लिया और वह अपनी बलि देने के लिए चट्टान पर लेट गए। जब गरुण आए, तो उन्होंने लाल कपड़े में ढके जीव को देखा और वह उसे पहाड़ की ऊंचाई पर उठा ले गए। पंजों में जकड़े हुए जब पीड़ा के कारण जीमूतवाहन कराहने लगे और तब गरुड़ की उनपर नजर पड़ी और उन्होंने जीमूतवाहन से पूछा कि वह कौन हैं और नागों के स्थान पर वह क्या कर रहे हैं। इसके बाद जीमूतवाहन ने गरुड़ राज को पूरी बात बताई। जीमूत वाहन की बहादुरी और त्याग से गरुण प्रसन्न हुए।
इसके बाद गरुड़ राज ने न केवल जीमूत वाहन को जीवनदान दिया बल्कि यह भी प्रतिज्ञा ली कि वे आगे से नागों की बलि नहीं लेंगे। कहते हैं इसी घटना के बाद से जीमूत वाहन की पूजा की परंपरा शुरू हुई।
तीसरी कथा
जितिया व्रत की एक कथा महाभारत काल से जुड़ी है। कहते हैं महाभारत युद्ध में अपने पिता गुरु द्रोणाचार्य की मृत्यु का बदला लेने के लिए अश्वत्थामा पांडवों के शिविर में घुस गया। उसने शिविर के अंदर पांच लोग को सोया पाए, अश्वत्थामा ने उन पांच लोगों को पांच पांडव समझकर मार दिया, परंतु वे द्रोपदी और पांडवों की पांच संतानें थीं। उसके उपरांत अुर्जन ने अश्वत्थामा की दिव्य मणि उसके माथे से निकाल ली।
अश्वत्थामा ने बदला लेने के लिए अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहे बच्चे को मारने की कोशिश की। जिसके लिए उसने उत्तरा के गर्भ पर ब्रह्मास्त्र से वार किया। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तरा की अजन्मी संतान को फिर से जीवित कर दिया। पुनः जीवित होने के कारण उसका नाम जीवित पुत्र पड़ा।
चूंकि श्री कृष्ण ने उत्तरा की भी रक्षा की थी इसी कारण से वह जीवितपुत्रिका कहलाईं। ऐसी मान्यता है कि इस घटना के बाद से ही जीवितपुत्रिका या जितिया व्रत का आरंभ हुआ।
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